शनिवार, 9 जून 2012

रचाव


कांई लागै आपनै
रचीज जावै कोई कविता इयां ई 
कोई आलीसान कमरां मांय
अेसी री ठंडक अर कॉफी रै घूंट साथै
का आ सोच'र कै चलो आज छुट्टी है 
मांड ई नाखां दो-च्यार कवितावां?
इण भांत ई उपज्या करै कविता!
नीं भायला नीं, 
कविता तो उपजै 
कदे बस री भीड़ मांय 
धक्कां रै बिचाळै
कदे राशन री कतार मांय ऊभां-ऊभां 
कदे न्हावतां, गुणगुणांवतां
अर कदे किणी री मुळक माथै रीझ'र
का पछै किणी रै आंसुवां सूं पसीज'र
अै कदे ई, कठै ई 
आ जावै है मन मांय बीज री भांत
अर कूंपळ री भांत फूट'र काळजै मांय
मंड जावै कागद री पीठ पर
कई बर टिगट रै लारलै पासै
सिगरेट री पन्नी माथै
का फेर कोई रसीद
का किणी रफ पानै माथै
आडै-टेढै अर मोटै आखरां मांय।
जे संभाळ ली जावै तो 
दिख जावै किणी किताब रै पानां माथै
का पछै किणी ब्लॉग का डायरी मांय। 
निस तो अै सबदां रा चितराम 
दब्या ई रैय जावै 
किताबां मांय 
का पछै धुप जावै  
जेबां मांय।
धुप जावै तो धुप जावै
पण भळै फूट पड़ै
कोई अैड़ै ई माहौल में
आपरै दूणै-चौगुणै वेग साथै।
कविता तो अजर-अमर है।

बृहस्पतिवार, 10 मार्च 2011

नैणां भरल्यूं रंग

पौ फाट्यां
देखूं
पोलो ग्राउंड सूं
सूरज उग्यां तक लगोलग
भाखरां माथै बादळां रा रंग
भांत-भंतीला।
बदळै है छिण-छिण ऐ रंग
आपरो रूप,
जिकां में
म्हारी ओळख रै रंगां सूं अळगा
कीं नूंवां रंग,
ज्यां रो नीं जाणूं म्हैं नांव।
पण चावूं-
चुण-चुण भर लेवूं ऐ सगळा
नैणां मांय
अर जाय'र छिड़क द्यूं
म्हारै थार री माटी मांय,
अकाळ सूं जूझता घरां माथै,
किणी गरीब रै चूल्है रै असवाड़ै-पसवाड़ै
ओळूं मांय उदास दिलां री भींतां पर।
भर सक्यो जे ऐ रंग
तो नेहचो राखो
चटकै ही
बावड़ूंलो म्हैं आं रंगां साथै
पाछो आपणी माटी मांय।

** पोलो ग्राउंड आईएएस अकेडमी रो एक भाग है, जिको मुख्य बिल्डिंग सूं डेढ-दो किलोमीटर हेटै है अर ट्रेनिंग री पीटी अठै ही होवै है। चौफेर पहाड़ियां सूं घिरी इण ठौड़ री सोभा घणी निराळी है।

सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

टाबर

बाळपणैं में
सोय जांवतो मां री खोळां
खेलण नै बाफर ही
फगत एक खटोलड़ी।
पीसां रो अरथ हो फगत
फाँक संतरै वाळी।
नान्हो-सो हो डील
फगत इतरो कै
ल्हुक ज्यांवतो
माटली लारै।

हरेक सिंझ्यां लावती
म्हारै सारू
धूड़ रो फूल
जिणनै निरख-निरख
बजांवतो ताळी
रेवड़ री टाली
गाय-बछडिय़ां रै मेळ रो
निराळो सुर
भांवतो हो म्हानै
भांवती ही बा उडती खंख
जिणरी सौरम
म्हारै मन में बसी है
अजे तक।

बाळपणो मनभावणो म्हारो
जिणमें कदे लड़्या,
कदे मिल्या,
मुळक्या,
खिल्या।
कदे ही नीं चिणी म्हे भींत
मन रै आंगणियां,
नीं जाणी तेर-मेर
जाणता हा
आखै बास री रोट्यां रो सुवाद।

आज नीं ल्हुक सकूं
म्हारै कूड़ै बड़प्पण सूं
सोचूं-
आछो होवै है टाबर होवणो
पण कित्तो दोरो है आज
टाबर होवणो?

शुक्रवार, 21 मई 2010

फुटपाथ पर बैठ्यै बाप रा सुपना

सड़क बिचाळै
फुटपाथ पर बैठ्यै
बाप रा सुपना
होग्या ईंट रा,
सिमटगी सोच
एक कमरै मांय।
एक कमरो बण्यां पाछै
नीं दिखै
कमरै रै बा'र स्यूं
फाट्योड़ा गाबां मांय
लगोलग जुवान होंवती
बीं री तीन छोरियां,
नीं दिखैला
बै सारा
पाणी स्यूं
पेट नै स्हारो देंवता।
छात अर भींतां
छुपा सकै
बां रा कई दुख,
ऐ बातां
कदै ई नीं जाणै
महलां मांय रैवण वाळा।
च्यार दीवारां अर
छात री कीमत
जाणै है
आसमान री छात तळै
फगत एक
बूढो बाप।

मिनख-लुगाई

मिनख
बाद में बणै है
बाप,
भाई,
घरधणी
अर बेटो,
पैलां हुवै है
सदां ई मिनख।
अर लुगाई
सदां ई हुवै
मां,
बैन,
जोड़ायत
अर बेटी,
पण आखी जूण
कदै नीं बण सकै
फगत एक लुगाई।

मंगलवार, 23 मार्च 2010

गज़ल

मन मांय सदा आस जगा'र राखो
कुंदन बने सारूं खुद ने तपा'र राखो

आराम मांय नीं मिले जिनगाणी रो सुख
ईं री साची पिछाण फगत पसीने स्यूं राखो

सो'रै राह पर हुवै सदा ही कांटा
उतार चढ़ाव मांय महकता गुलाब राखो

इतिहास रच
ण आळा नीं मुड़े मारग स्यूं पाछा
थे भी मारग में पगां रा निसान बणा'र राखो

बुलबुले तरियां छोटी सी जिनगाणी पण
इरादां रै सूरज री ईं पर सतरंगी छाप बणा'र राखो

शनिवार, 20 फरवरी 2010

कींकर

मांगीड़ै रै खेत
अर नै'र बिचाळै री
कींकर नीं जाणै
ग्लोबल वार्मिंग
आतंकवाद
अर राजनीति रा खेल।
नीं पिछाणै
ओबामा
सोनिया
मुशर्रफ।
कींकर जाणै
फगत आ बात
कै जद भरयोड़ी चालै नै'र
तो पूगज्यै
मांगीड़ै री घरवाळी
खेत मांय।
अर टाबर हुळसता तोड़ै
पातड़ी।
जद घटज्यै नै'र रो पाणी
तो टळकै मांगीड़ै री आंख
अर सूखती नै'र रै सागै
खेत होज्यै उजाड़
बच ज्याऊं म्हैं अ'कलो
उडीकतो
नै'र रो पाणी!