कांई लागै आपनै
रचीज जावै कोई कविता इयां ई
कोई आलीसान कमरां मांय
अेसी री ठंडक अर कॉफी रै घूंट साथै
का आ सोच'र कै चलो आज छुट्टी है
मांड ई नाखां दो-च्यार कवितावां?
इण भांत ई उपज्या करै कविता!
नीं भायला नीं,
कविता तो उपजै
कदे बस री भीड़ मांय
धक्कां रै बिचाळै
कदे राशन री कतार मांय ऊभां-ऊभां
कदे न्हावतां, गुणगुणांवतां
अर कदे किणी री मुळक माथै रीझ'र
का पछै किणी रै आंसुवां सूं पसीज'र
अै कदे ई, कठै ई
आ जावै है मन मांय बीज री भांत
अर कूंपळ री भांत फूट'र काळजै मांय
मंड जावै कागद री पीठ पर
कई बर टिगट रै लारलै पासै
सिगरेट री पन्नी माथै
का फेर कोई रसीद
का किणी रफ पानै माथै
आडै-टेढै अर मोटै आखरां मांय।
जे संभाळ ली जावै तो
दिख जावै किणी किताब रै पानां माथै
का पछै किणी ब्लॉग का डायरी मांय।
निस तो अै सबदां रा चितराम
दब्या ई रैय जावै
किताबां मांय
का पछै धुप जावै
जेबां मांय।
धुप जावै तो धुप जावै
पण भळै फूट पड़ै
कोई अैड़ै ई माहौल में
आपरै दूणै-चौगुणै वेग साथै।
कविता तो अजर-अमर है।

